टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ · अंतिम समीक्षा: अक्टूबर 2026 · 6 मिनट में पढ़ें
Read in English: Domestic Violence Act guide
संक्षिप्त उत्तर: घर में हिंसा या उत्पीड़न झेल रही महिला घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) की धारा 12 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन कर सकती है — सीधे या अपने ज़िले के संरक्षण अधिकारी (Protection Officer) के माध्यम से। मजिस्ट्रेट संरक्षण आदेश, निवास आदेश, भरण-पोषण सहित आर्थिक राहत, बच्चों की अस्थायी कस्टडी और मुआवज़े का आदेश दे सकते हैं, और धारा 23 के तहत अंतरिम या एकपक्षीय (ex parte) आदेश भी दे सकते हैं। संरक्षण आदेश तोड़ना धारा 31 के तहत अपराध है।
घरेलू हिंसा कानून में "घरेलू हिंसा" किसे माना जाता है?
अधिनियम की धारा 3 में घरेलू हिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। यह सिर्फ़ मारपीट तक सीमित नहीं है। इसमें शामिल हैं:
- शारीरिक हिंसा — मारना, धक्का देना या कोई भी काम जिससे शरीर को चोट या दर्द पहुँचे
- यौन हिंसा — ऐसा व्यवहार जो महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाए या अपमानित करे
- मौखिक और भावनात्मक हिंसा — गाली-गलौज, अपमान, ताने (जैसे बेटा या बच्चा न होने पर), और बार-बार धमकी देना
- आर्थिक हिंसा — घर खर्च, स्त्रीधन या किराए के लिए पैसा न देना, घर का सामान या उसकी संपत्ति बेच देना, या उसे साझा घर के इस्तेमाल से रोकना
- दहेज उत्पीड़न — दहेज या संपत्ति की गैरकानूनी माँग के लिए महिला या उसके रिश्तेदारों को परेशान करना
घरेलू हिंसा का केस कौन कर सकता है, और किसके ख़िलाफ़?
कानून में महिला को "व्यथित व्यक्ति" (aggrieved person) कहा गया है (धारा 2(a))। ज़रूरी है कि वह प्रतिवादी के साथ "घरेलू संबंध" में हो या रही हो — यानी शादी, शादी जैसे संबंध (जैसे लिव-इन रिलेशनशिप), खून के रिश्ते या गोद लेने के कारण एक ही घर में साथ रहती हो या रही हो (धारा 2(f))। इसलिए पत्नी, लिव-इन पार्टनर, माँ, बहन, विधवा या बेटी — सभी इस कानून का सहारा ले सकती हैं।
"प्रतिवादी" (respondent) की परिभाषा धारा 2(q) में है। पत्नी या लिव-इन पार्टनर पति या पुरुष साथी के रिश्तेदारों को भी पक्षकार बना सकती है। अदालतों ने आम तौर पर इस परिभाषा को व्यापक रूप में पढ़ा है, इसलिए आवेदनों में अक्सर घर के पुरुष और महिला, दोनों सदस्यों के नाम होते हैं।
संरक्षण अधिकारी कौन होता है और वह कैसे मदद करता है?
संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार धारा 8 के तहत करती है। उत्तर प्रदेश में आम तौर पर हर ज़िले का ज़िला प्रोबेशन अधिकारी (District Probation Officer) संरक्षण अधिकारी का काम करता है। धारा 9 और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण नियम, 2006 के नियम 8 के अनुसार संरक्षण अधिकारी:
- घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) फ़ॉर्म I में दर्ज करके मजिस्ट्रेट, स्थानीय थाने और सेवा प्रदाताओं को भेजता है
- फ़ॉर्म II में आवेदन तैयार करने और दाख़िल करने में मदद करता है
- महिला के साथ मिलकर सुरक्षा योजना (फ़ॉर्म V) बनाता है
- आश्रय, मेडिकल जाँच और मुफ़्त कानूनी सहायता की व्यवस्था करता है
- प्रतिवादी को केस का नोटिस तामील कराता है
- यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि आर्थिक राहत का पैसा वास्तव में मिले
जिस किसी को लगता है कि घरेलू हिंसा हो रही है, वह संरक्षण अधिकारी को सूचना दे सकता है (धारा 4)। शिकायत पाने वाली पुलिस, संरक्षण अधिकारी, सेवा प्रदाता या मजिस्ट्रेट को महिला को उसके अधिकार बताने होते हैं, जिसमें विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत मुफ़्त कानूनी सहायता भी शामिल है (धारा 5)।
मजिस्ट्रेट के सामने घरेलू हिंसा का केस कैसे दाख़िल करें? (क्रमवार)
- संरक्षण अधिकारी, पंजीकृत सेवा प्रदाता या सीधे अदालत से संपर्क करें। संरक्षण अधिकारी के ज़रिए आवेदन देना आम है, पर ज़रूरी नहीं। महिला ख़ुद या वकील के माध्यम से भी आवेदन दे सकती है।
- घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) दर्ज कराएँ। इसमें घटनाएँ, तारीख़ें और चोटें दर्ज होती हैं। मजिस्ट्रेट को इस पर विचार करना होता है (धारा 12(1) का परंतुक)।
- धारा 12 के तहत फ़ॉर्म II में आवेदन दें। हर राहत साफ़ लिखें: संरक्षण, निवास, आर्थिक राहत, कस्टडी, मुआवज़ा।
- सही अदालत चुनें। धारा 27 के अनुसार आवेदन उस प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दिया जा सकता है जहाँ आप रहती हैं (अस्थायी रूप से भी), काम करती हैं या व्यवसाय करती हैं, जहाँ प्रतिवादी रहता या काम करता है, या जहाँ हिंसा हुई।
- ज़रूरत हो तो तुरंत अंतरिम या एकपक्षीय राहत माँगें। फ़ॉर्म III में हलफ़नामा दें (धारा 23(2) और नियम 7), जिसमें तत्काल ख़तरे का विवरण हो।
- पहली सुनवाई में उपस्थित रहें। मजिस्ट्रेट आम तौर पर आवेदन मिलने के तीन दिन के भीतर पहली सुनवाई तय करते हैं (धारा 12(4))। संरक्षण अधिकारी को दो दिन के भीतर प्रतिवादी को नोटिस तामील कराना होता है (धारा 13)।
- काउंसलिंग और अंतिम आदेश। मजिस्ट्रेट काउंसलिंग का निर्देश दे सकते हैं (धारा 14), अनुरोध पर सुनवाई बंद कमरे (in camera) में कर सकते हैं (धारा 16), और पहली सुनवाई से 60 दिन के भीतर केस निपटाने का प्रयास करते हैं (धारा 12(5)), हालाँकि व्यवहार में अक्सर ज़्यादा समय लगता है।
मजिस्ट्रेट कौन-कौन से आदेश दे सकते हैं?
- संरक्षण आदेश (धारा 18): प्रतिवादी को हिंसा करने, महिला के कार्यस्थल या बच्चों के स्कूल में जाने, उससे संपर्क करने, संयुक्त बैंक खाते या लॉकर चलाने, या उसका स्त्रीधन बेचने से रोकता है।
- निवास आदेश (धारा 19): प्रतिवादी को महिला को साझा घर से निकालने से रोकता है, प्रतिवादी को घर से हटाता है, या उसे उसी स्तर का दूसरा मकान दिलाने या किराया देने का निर्देश देता है। किसी महिला को घर छोड़ने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
- आर्थिक राहत (धारा 20): कमाई का नुकसान, इलाज का ख़र्च, संपत्ति का नुकसान, और महिला व बच्चों का भरण-पोषण। राशि उचित होनी चाहिए और उस जीवन-स्तर के अनुसार होनी चाहिए जिसकी वह आदी है। यह एकमुश्त या मासिक हो सकती है।
- कस्टडी आदेश (धारा 21): बच्चों की अस्थायी कस्टडी, प्रतिवादी को मिलने का अधिकार देकर या बिना दिए।
- मुआवज़ा आदेश (धारा 22): चोटों के लिए, जिसमें मानसिक प्रताड़ना और भावनात्मक पीड़ा भी शामिल है।
क्या मुझे ससुराल (वैवाहिक घर) में रहने का अधिकार है?
हाँ। धारा 17 घरेलू संबंध में रहने वाली हर महिला को "साझा घर" (shared household) में रहने का अधिकार देती है, चाहे उस घर में उसका मालिकाना हक़ हो या न हो। धारा 2(s) के अनुसार साझा घर में दोनों में से किसी का भी अपना या किराए का घर, या वह संयुक्त परिवार का घर शामिल है जिसका प्रतिवादी सदस्य है। कानूनी प्रक्रिया के बिना महिला को घर से नहीं निकाला जा सकता। अदालतों ने आम तौर पर इस अधिकार और परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकारों के बीच संतुलन रखा है, इसीलिए मजिस्ट्रेट कई बार दूसरा मकान या किराया दिलाने का आदेश देते हैं।
क्या DV Act और धारा 144 BNSS, दोनों में भरण-पोषण मिल सकता है?
धारा 20 के तहत भरण-पोषण, धारा 125 CrPC (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 BNSS) के आदेश के अतिरिक्त भी दिया जा सकता है। धारा 26 के अनुसार यही राहतें चल रहे तलाक़ या अन्य पारिवारिक केस में भी माँगी जा सकती हैं। लेकिन कहीं और मिले भरण-पोषण की जानकारी मजिस्ट्रेट को देनी होती है (धारा 26(3)), और अदालतें आम तौर पर दोहरा भुगतान रोकने के लिए एक राशि को दूसरी में समायोजित करती हैं।
अगर पति पैसा न दे या आदेश तोड़े तो क्या करें?
- पैसा न देने पर: धारा 20(6) के तहत मजिस्ट्रेट उसके नियोक्ता (employer) या देनदार को निर्देश दे सकते हैं कि उसके वेतन या बकाया का हिस्सा सीधे महिला को या अदालत में जमा करें। नियम 6(5) के अनुसार आदेश भरण-पोषण आदेश की तरह भी लागू कराए जाते हैं — अब धारा 147 BNSS (पुरानी धारा 128 CrPC) के तहत।
- संरक्षण आदेश तोड़ने पर: यह धारा 31 के तहत अपराध है — एक साल तक की जेल, ₹20,000 तक जुर्माना, या दोनों। यह संज्ञेय और ग़ैर-ज़मानती है (धारा 32)। इसकी शिकायत संरक्षण अधिकारी, पुलिस या मजिस्ट्रेट से करें (नियम 15)।
- अपील: कोई भी पक्ष आदेश की तामील से 30 दिन के भीतर सत्र न्यायालय में अपील कर सकता है (धारा 29)।
अगर तथ्यों से क्रूरता या दहेज की माँग भी दिखती है, तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86 BNS (पुरानी धारा 498A IPC) या दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत आपराधिक शिकायत अलग से चल सकती है। DV Act दूसरे कानूनों के अतिरिक्त है, उनकी जगह नहीं (धारा 36)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या घरेलू हिंसा का केस आपराधिक केस है?
धारा 12 का आवेदन आपराधिक अदालत (मजिस्ट्रेट) तय करती है, लेकिन राहतें मुख्य रूप से दीवानी प्रकृति की हैं: संरक्षण, निवास, भरण-पोषण और मुआवज़ा। मामला आपराधिक तभी बनता है जब प्रतिवादी संरक्षण आदेश तोड़े, जो धारा 31 के तहत अपराध है।
क्या लिव-इन पार्टनर DV Act में केस कर सकती है?
हाँ। धारा 2(f) में "घरेलू संबंध" में शादी जैसा संबंध भी शामिल है, इसलिए ऐसे लिव-इन संबंध में रहने वाली महिला आवेदन कर सकती है।
क्या संरक्षण अधिकारी के ज़रिए ही केस करना ज़रूरी है?
नहीं। महिला ख़ुद या वकील के माध्यम से सीधे मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दे सकती है। घरेलू घटना रिपोर्ट, नोटिस, आश्रय और कानूनी सहायता के लिए संरक्षण अधिकारी की मदद उपयोगी रहती है।
अंतरिम आदेश कितनी जल्दी मिल सकता है?
पहली सुनवाई आम तौर पर आवेदन के तीन दिन के भीतर होनी चाहिए (धारा 12(4))। ज़रूरी मामलों में मजिस्ट्रेट फ़ॉर्म III में महिला के हलफ़नामे पर धारा 23(2) के तहत एकपक्षीय अंतरिम आदेश दे सकते हैं।
क्या घरेलू हिंसा के मामलों में महिलाओं को मुफ़्त कानूनी सहायता मिलती है?
हाँ। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत महिलाएँ ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से मुफ़्त कानूनी सहायता की हक़दार हैं। संरक्षण अधिकारी को इसकी व्यवस्था में मदद करनी होती है।
लखनऊ में घरेलू हिंसा का केस किस अदालत में होता है?
धारा 27 के तहत क्षेत्राधिकार वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने — जहाँ महिला रहती या काम करती है, जहाँ प्रतिवादी रहता या काम करता है, या जहाँ हिंसा हुई।
लेखक: टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ
ईमेल: rishi.saxena@neerajassociates-legal.com · फ़ोन: +91 8960006363
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अस्वीकरण: यह लेख अक्टूबर 2026 तक की सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। कानून बदलते रहते हैं और हर मामला उसके तथ्यों पर निर्भर करता है। अपनी स्थिति के बारे में किसी अधिवक्ता से सलाह लें।
Disclaimer: This article is general information about Indian law and is not legal advice. Laws, rules and court rulings change, and your situation may differ. Please consult an advocate before acting.
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