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पत्नी का भरण-पोषण और स्थायी गुज़ारा भत्ता: धारा 144 BNSS और हिंदू विवाह अधिनियम

धारा 144 BNSS और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24, 25 में भरण-पोषण कैसे माँगें: अंतरिम राशि, रकम कैसे तय होती है, गुज़ारा भत्ता और वसूली।

By the legal team at Neeraj Associates · Updated 24 October 2026 · 7 min read

Practice areas: Family Law Matrimonial Cases Divorce Cases

टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ · अंतिम समीक्षा: अक्टूबर 2026 · 7 मिनट में पढ़ें

Read in English: Wife's maintenance and permanent alimony

संक्षिप्त उत्तर: जो पत्नी अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती, वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 (पुरानी धारा 125 CrPC) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट से पति से मासिक भरण-पोषण माँग सकती है। अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन यथासंभव नोटिस के 60 दिन के भीतर तय होना चाहिए। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत चल रहे वैवाहिक केस में पति या पत्नी, कोई भी धारा 24 के तहत भरण-पोषण और मुक़दमे का ख़र्च माँग सकता है। तलाक़ की डिक्री के समय या बाद में अदालत धारा 25 के तहत स्थायी गुज़ारा भत्ता (permanent alimony) दिला सकती है, एकमुश्त या किस्तों में। पति भुगतान न करे तो आदेश वसूली वारंट, कुर्की और छोटी अवधि की जेल से भी लागू कराया जा सकता है।

भरण-पोषण के मुख्य रास्ते

  • धारा 144 BNSS (मजिस्ट्रेट): त्वरित, संक्षिप्त उपाय। यह पत्नी (तलाक़शुदा पत्नी भी, जिसने दोबारा शादी न की हो), बच्चों और माता-पिता के लिए है, उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ जिसके पास पर्याप्त साधन हों और जो उनका भरण-पोषण करने से इनकार या उपेक्षा करे। यह सभी धर्मों पर लागू है।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24: केस चलने के दौरान भरण-पोषण (pendente lite) और मुक़दमे का ख़र्च, पति या पत्नी में से उसे जिसकी अपनी पर्याप्त आय नहीं है। आवेदन यथासंभव नोटिस की तामील के 60 दिन के भीतर तय होना चाहिए।
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25: डिक्री के समय या बाद में स्थायी गुज़ारा भत्ता और भरण-पोषण, एकमुश्त रकम या मासिक/आवधिक भुगतान के रूप में।
  • हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18: हिंदू पत्नी का जीवनभर पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार। क्रूरता या परित्याग जैसी स्थितियों में अलग रहने का अधिकार भी इसमें शामिल है।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम, धारा 20: DV केस में भरण-पोषण सहित आर्थिक राहत। देखें हमारी घरेलू हिंसा अधिनियम गाइड।

ये उपाय साथ-साथ चल सकते हैं। एक केस में मिली रकम की जानकारी दूसरे केस में देनी होती है। अदालतें आम तौर पर एक रकम को दूसरी में समायोजित करती हैं, ताकि एक ही ज़रूरत के लिए पति को दो बार भुगतान न करना पड़े।

धारा 144 BNSS में कौन दावा कर सकता है?

  • पत्नी, जो अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती। इसमें वह तलाक़शुदा पत्नी भी शामिल है जिसने दोबारा शादी नहीं की।
  • नाबालिग बच्चे, वैध हों या नहीं, और वे बालिग बच्चे जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते।
  • पिता या माता, जो अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते।

दावा उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ होता है जिसके पास पर्याप्त साधन हों और जो भरण-पोषण से इनकार या उपेक्षा करे। शारीरिक रूप से सक्षम पति से आम तौर पर कमाने की अपेक्षा की जाती है। BNSS में मासिक रकम की कोई ऊपरी सीमा नहीं है।

पत्नी कब हक़दार नहीं होती?

धारा 144(4) BNSS के अनुसार पत्नी भरण-पोषण की हक़दार नहीं है अगर:

  • वह व्यभिचार में रह रही हो
  • वह बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से इनकार करे
  • दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों

अगर पति इस शर्त पर भरण-पोषण देने को कहे कि पत्नी उसके साथ रहे, तो मजिस्ट्रेट पत्नी के इनकार के कारणों पर विचार करते हैं। पति का दूसरी शादी करना या किसी और महिला को रखना पत्नी के अलग रहने का उचित आधार माना जाता है।

धारा 144 में कहाँ और कैसे आवेदन करें

  1. अदालत चुनें: प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट, या जहाँ फ़ैमिली कोर्ट है (जैसे लखनऊ) वहाँ फ़ैमिली कोर्ट। आवेदन वहाँ हो सकता है जहाँ पति रहता है, जहाँ पत्नी रहती है, या जहाँ दोनों आख़िरी बार साथ रहे (धारा 145 BNSS)।
  2. आवेदन दें। इसमें विवाह, बच्चों, पति की आय और संपत्ति, अपनी आय और ख़र्च, और भरण-पोषण से इनकार या उपेक्षा का विवरण हो।
  3. संपत्ति, आय और देनदारियों का हलफ़नामा दें। अदालतें अब दोनों पक्षों से यह जानकारी माँगती हैं, इसलिए वेतन पर्ची, ITR, बैंक स्टेटमेंट और संपत्ति का विवरण तैयार रखें।
  4. शुरुआत में ही अंतरिम भरण-पोषण और मुक़दमे का ख़र्च माँगें। यह यथासंभव नोटिस के 60 दिन के भीतर तय होना चाहिए।
  5. अंतिम आदेश: भत्ता आदेश की तारीख़ से, या अदालत कहे तो आवेदन की तारीख़ से, देय होता है (धारा 144(2))।

रकम कैसे तय होती है?

कानून में कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है। अदालतें आम तौर पर देखती हैं:

  • दोनों की आय और कमाने की क्षमता
  • विवाह के दौरान का जीवन-स्तर
  • पत्नी और बच्चों की ज़रूरतें, जिनमें स्कूल फ़ीस और इलाज का ख़र्च भी है
  • पति की उचित देनदारियाँ और उस पर निर्भर लोग
  • किसी भी पक्ष के नाम संपत्ति

परिस्थिति बदलने पर रकम बाद में बढ़ाई या घटाई जा सकती है: धारा 144 के आदेशों के लिए धारा 146 BNSS, और गुज़ारा भत्ते के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25(2)।

धारा 25 के तहत स्थायी गुज़ारा भत्ता

तलाक़ की डिक्री के समय या बाद में अदालत पति को (और कुछ मामलों में पत्नी को) स्थायी गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है। यह एकमुश्त रकम हो सकती है या मासिक भुगतान। अदालत दोनों की आय, संपत्ति और आचरण पर विचार करती है। भुगतान को अचल संपत्ति पर भार (charge) डालकर सुरक्षित किया जा सकता है। आदेश बदला जा सकता है, और पाने वाला पक्ष दोबारा शादी कर ले, या पत्नी के मामले में वह पवित्र न रही हो, तो रद्द भी किया जा सकता है। आपसी सहमति से तलाक़ में आम तौर पर पूर्ण और अंतिम समझौते के रूप में एकमुश्त रकम तय होती है। देखें हमारी आपसी सहमति से तलाक़ गाइड।

अगर पति भुगतान न करे?

  • धारा 144(3) BNSS के तहत: बिना पर्याप्त कारण हर महीने की चूक पर मजिस्ट्रेट रकम को जुर्माने की तरह वसूलने के लिए वारंट जारी कर सकते हैं, और एक महीने तक या भुगतान होने तक की जेल का आदेश दे सकते हैं। वसूली का आवेदन रकम देय होने की तारीख़ से एक साल के भीतर देना ज़रूरी है, इसलिए बकाया जमा न होने दें।
  • कहीं भी लागू: पति जहाँ भी हो, वहाँ का कोई भी मजिस्ट्रेट आदेश लागू करा सकता है (धारा 147 BNSS)।
  • हिंदू विवाह अधिनियम के आदेश दीवानी डिक्री की तरह लागू होते हैं, जिसमें वेतन और संपत्ति की कुर्की भी शामिल है।
  • तलाक़ केस में अंतरिम भरण-पोषण न देने पर अदालत पति का बचाव ख़ारिज कर सकती है या उसकी अपनी कार्यवाही रोक सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या कामकाजी पत्नी भरण-पोषण माँग सकती है?

हाँ, अगर उसकी आय उस जीवन-स्तर के लिए काफ़ी न हो जिसकी वह आदी है। रकम तय करते समय उसकी आय गिनी जाती है।

क्या पति पत्नी से भरण-पोषण माँग सकता है?

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और 25 में आय के आधार पर पति या पत्नी, कोई भी दावा कर सकता है। धारा 144 BNSS में पति को पत्नी के ख़िलाफ़ दावे का अधिकार नहीं है।

क्या आवेदन की तारीख़ से भरण-पोषण मिल सकता है?

हाँ। अदालत आवेदन की तारीख़ से भरण-पोषण का आदेश दे सकती है (धारा 144(2) BNSS), और केस में लगने वाले समय की भरपाई के लिए अक्सर ऐसा किया जाता है।

अगर पति कहे कि उसकी कोई आय नहीं है?

अदालत सिर्फ़ घोषित वेतन नहीं, बल्कि कमाने की क्षमता, रहन-सहन, संपत्ति और बैंक रिकॉर्ड देखती है। दोनों पक्षों को हलफ़नामे पर संपत्ति और आय बतानी होती है।

क्या DV Act का भरण-पोषण धारा 144 से अलग है?

ये अलग उपाय हैं और साथ चल सकते हैं, लेकिन एक में मिली रकम दूसरे में समायोजित होती है।

लेखक: टीम नीरज एसोसिएट्स, लखनऊ

ईमेल: rishi.saxena@neerajassociates-legal.com · फ़ोन: +91 8960006363

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अस्वीकरण: यह लेख अक्टूबर 2026 तक की सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। कानून बदलते रहते हैं और हर मामला उसके तथ्यों पर निर्भर करता है। अपनी स्थिति के बारे में किसी अधिवक्ता से सलाह लें।

Disclaimer: This article is general information about Indian law and is not legal advice. Laws, rules and court rulings change, and your situation may differ. Please consult an advocate before acting.

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